बिहार के ‘संकटमोचक’ धर्मेंद्र प्रधान का बढ़ा राजनीतिक कद , बिहार चुनाव परिणाम के बाद तय होगा अगला भाजपा अध्यक्ष
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में सीटों के बंटवारे को लेकर चल रहा लंबा गतिरोध केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार समाप्त हो गया। भाजपा के बिहार प्रभारी प्रधान इस जटिल समझौते के मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आए। उनकी राजनीतिक सूझबूझ का ही परिणाम है कि इस बार भाजपा (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) को लगभग बराबर सीटें मिली हैं, जिससे गठबंधन में जेडीयू का ‘बड़े भाई’ वाला दर्जा समाप्त हो गया। दोनों दल पहली बार समान भूमिका में चुनावी मैदान में उतरेंगे।
धर्मेंद्र प्रधान की इस सफलता ने उनके राजनीतिक कद को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज़ हो गई है कि बिहार चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे कि भाजपा अध्यक्ष की कमान किसके हाथ में जाएगी।
गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी धर्मेंद्र प्रधान ने ओडिशा में भाजपा को 21 में से 20 सीटें दिलाकर केंद्र में भाजपा सरकार की वापसी में अहम योगदान दिया। अब बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि भाजपा अध्यक्ष की कमान किसे मिलेगी — और क्या धर्मेंद्र प्रधान का कद संगठन में और ऊंचा होगा।
सीटों के बंटवारे की पूरी प्रक्रिया में सबसे कठिन चुनौती लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान के साथ तालमेल बनाना था। चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही चिराग खेमे ने 40 से अधिक सीटों की मांग करते हुए दबाव बनाना शुरू कर दिया।
अपनी संयमित संवाद शैली के लिए पहचाने जाने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने सहयोगी दलों से कई दौर की बातचीत की, लेकिन चिराग तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। गतिरोध तोड़ने के प्रयास में प्रधान और भाजपा महासचिव विनोद तावड़े चिराग पासवान के आवास पर भी पहुंचे, परंतु बैठक बेनतीजा रही। केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय के हस्तक्षेप के बावजूद चिराग अपने रुख पर अडिग रहे।
यह गतिरोध तब समाप्त हुआ जब देर रात चिराग के आवास पर एक लंबी बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार, धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी तीक्ष्ण राजनीतिक समझ का उपयोग करते हुए चिराग को 29 सीटों के अंतिम समझौते पर सहमत कर लिया। बैठक के बाद दोनों नेताओं की मुस्कान ने बिहार चुनाव से पहले एनडीए की सबसे अहम बातचीत के सफल अंत का संकेत दिया।
भाजपा के भरोसेमंद ‘क्राइसिस मैनेजर’
इस सहज समझौते के पीछे धर्मेंद्र प्रधान की रणनीति थी, जो पार्टी के भरोसेमंद ‘क्राइसिस मैनेजर’ माने जाते हैं। उन्हें अक्सर तब मैदान में उतारा जाता है जब राजनीतिक परिस्थितियाँ जटिल हों। बिहार की राजनीति में उनका अनुभव गहरा और प्रभावशाली रहा है। उन्होंने 2010 में एनडीए की भारी जीत (243 में से 206 सीटें) और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की पटकथा लिखने में अहम भूमिका निभाई थी।
प्रधान की सफलता केवल बिहार तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने उत्तर प्रदेश (2022) में भाजपा की लगातार दूसरी जीत, हरियाणा (2024) में तीसरी बार सरकार बनवाने और उत्तराखंड (2017) में पार्टी को सत्ता में वापस लाने में भी निर्णायक भूमिका निभाई है। उनकी असली ताकत संगठन निर्माण कौशल और प्रभावशाली संवाद शैली में निहित है, जो उन्हें जटिल गठबंधनों के बीच भाजपा का सबसे विश्वसनीय रणनीतिकार बनाती है।
