बिहार विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियां प्रचार मोड में आ गई हैं। एक तरफ जहां भाजपा अपने सहयोगियों के साथ बेहतरीन कोऑर्डिनेशन के साथ नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ तमाम उठापटक के बाद गुरुवार को महागठबंधन ने मुख्यमंत्री का ऐलान किया। महागठबंधन में इस बार मुख्यमंत्री के अलावा दो उपमुख्यमंत्री का ऐलान किया गया है, जिनमें से एक उपमुख्यमंत्री मुकेश सहनी बनेंगे। हालांकि तमाम उठापटक के बाद महागठबंधन भले ही मुकेश सहनी के सामने झुक गया हो, लेकिन जानकार बताते हैं कि यह महागठबंधन के लिए नुकसान का सौदा साबित हो सकता है।
15 सीटों पर लड़ रहे चुनाव
बिहार विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी की पार्टी 15 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतार रही है। हालांकि इनमें कुछ ऐसी सीटें भी हैं जिन पर महागठबंधन के दूसरे दलों ने भी उम्मीदवार उतारा है। 2020 के विधानसभा चुनाव में प्रेस कॉन्फ्रेंस से उठकर मुकेश सहनी महागठबंधन खेमे से निकलकर NDA खेमे में पहुंच गए थे। इस दौरान उन्हें 11 सीटें दी गई थीं। सहनी भले ही अपना चुनाव हार गए थे, लेकिन उनकी पार्टी ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
NDA से भी रहा नाता
मुकेश सहनी का NDA से नाता रहा है। 2020 के चुनाव में वे NDA गठबंधन के साथ चुनाव लड़े थे। अब सवाल उठता है कि मुकेश सहनी जो 15 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, उनमें से कितनी सीटें जीत सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर वे 5-7 सीटें भी लाते हैं, तो क्या उन्हें फिर भी उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा, जबकि लेफ्ट पार्टियों को पूरी तरह इग्नोर कर दिया गया है। इसके अलावा, कई मौकों पर वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं। वे मल्लाह और बिंद जातियों को अनुसूचित जाति कैटेगरी में शामिल करने की वकालत करते रहे हैं। अगर भाजपा की तरफ से उनका यह प्रपोजल एक्सेप्ट किया जाता है, तो चुनाव बाद वे पाला बदल सकते हैं। चुनाव बाद परिस्थितियां क्या होंगी यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन उनके इधर-उधर जाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।
मुस्लिम वोट बैंक पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
महागठबंधन ने एक तरफ मुख्यमंत्री पद के लिए तेजस्वी यादव और उपमुख्यमंत्री पद के लिए मुकेश सहनी के नाम का ऐलान किया है, जबकि एक उपमुख्यमंत्री का पद कांग्रेस के खाते में गया है। ऐसे में राजद और महागठबंधन के पारंपरिक वोट बैंक में मुस्लिमों का बड़ा योगदान है। हालांकि इस घोषणा से मुस्लिम मतदाताओं को बड़ा झटका लगा है। चर्चा तेज हो गई है कि राजद और महागठबंधन मुसलमानों का इस्तेमाल सिर्फ वोट लेने के लिए करते हैं, लेकिन हिस्सेदारी नहीं देते। वहीं बिहार में प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ की नजर भी मुस्लिम मतदाताओं पर है। साथ ही सीमांचल में ओवैसी की पार्टी भी दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है। ऐसे में अगर मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव होता है, तो राजद और महागठबंधन को बड़ा झटका लग सकता है। इसका सीधा फायदा भाजपा और NDA गठबंधन को होने वाला है।
